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स्ट्रोक से बचाव के लिए समय पर इलाज और जागरूकता है जरूरी : डॉ. पृथ्वी गिरी






एनडी न्यूज, नोहर। स्ट्रोक के मामले देशभर में लगातार बढ़ते जा रहे हैं। यदि इसके आंकड़ों पर गौर करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर साल 15 मिलियन लोग स्ट्रोक से पीड़ित होते हैं। इनमें से 5 मिलियन की मृत्यु हो जाती है और अन्य 5 मिलियन विकलांग हो जाते हैं, जिससे उनके परिवार पर भी बोझ बढ़ता है। अब समझते हैं कि आखिर स्ट्रोक कैसे आता हैं? जब ब्रेन की नसों में खून प्रवाह रुक जाता है। इसके चलते ऑक्सीजन भी नहीं पहुंच पाते और सिर के अंदर की कोशिकाएं तुरंत मर जाती हैं। कई बार इसका दूसरा कारण सिर में ब्लीडिंग भी हो सकता है।
स्ट्रोक दो तरह के होते हैं इस्केमिक स्ट्रोक और हेमोरेजिक स्ट्रोक यह समस्या अधिकतर 60 वर्ष की आयु बाद लोगों में देखने को मिलती हैं, परंतु पिछले कुछ समय से 30 से 35 वर्ष की आयु के लोगों में भी ब्रेन स्ट्रोक के मामले बढ़ रहे हैं। अनुचित खानपान, व्यायाम की कमी व तनाव के कारण स्ट्रोक की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है, जो कि अपने आप में ही एक चिंता का विषय है इसलिए हर साल स्ट्रोक डे मनाया जाता है ताकि स्ट्रोक को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा सके।
स्ट्रोक के लक्षणों पर बात करते हुए एपेक्स हॉस्पिटल जयपुर के डॉ. पृथ्वी गिरी कंसल्टेंट न्यूरोलॉजी ने स्ट्रोक की स्थिति में अस्पताल पहुंचने में गोल्डन ऑवर के महत्व पर जोर देते हुए बताया कि गोल्डन ऑवर जो नस बंद होने के दो घंटे बाद तक रहता है। एक स्ट्रोक के बाद, प्रति मिनट 2 लाख से अधिक सिर के सेल्स मर जाते हैं। इस स्थिति में रोगी को नजदीकी अस्पताल ले जाना चाहिए और न केवल किसी अस्पताल, बल्कि स्ट्रोक के लिए तैयार अस्पताल, ताकि मस्तिष्क को बचाने के लिए जल्दी और सर्वोत्तम उपचार दिया जा सके, इसके अलावा स्ट्रोक के लक्षणों को समझना और तुरंत डॉक्टर के पास पहुंचना बहुत आवश्यक है, इसलिए कुछ ऐसे लक्षण होते हैं जो साफ तौर पर यह संदेश देते हैं कि मरीज को स्ट्रोक हुआ है जैसे – मरीज को बोलने और समझने में बहुत कठिनाई होना, शरीर के कुछ हिस्सों में कमजोरी आ जाना या फिर किसी अंग का सुन्न पड़ जाना, चलने और बैठने में मुश्किल होना, चक्कर आना और शारीरिक रूप से खुद को कमजोरी के महसूस होना एवं मरीज को बगैर किसी बीमारी के सिर में तेज दर्द होना आदि ।
स्ट्रोक के कारण व बचाव को लेकर बात करते हुए नारायणा हॉस्पिटल, जयपुर के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजी, डॉ. वैभव माथुर बताते हैं कि आजकल की अनियमित जीवनशैली, अस्वस्थ आहार, तनाव व शराब, सिगरेट और गुटखा के अत्यधिक सेवन इत्यादि के चलते व्यक्ति को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, दिल की बीमारी उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण स्ट्रोक आने की संभावना बनी रहती है। उन्होंने बताया कि क्लॉट-बस्टर प्राप्त करने वाले 30त्र व्यक्तियों में सुधार नहीं होता है क्योंकि वे प्रमुख स्ट्रोक या एलवीओ से पीड़ित होते हैं। यदि सामान्य लक्षणों को समझकर समय पर अस्पताल पहुंचा जाए तो इलाज मरीजों को उनकी जान बचाने के लिए अधिक प्रभावी ढंग से मदद कर सकता है। समय पर सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी जांच करके सिर के क्लिनिकल टेस्ट के बाद, डॉक्टर्स इलाज का सबसे अच्छा विकल्प चुन सकते हैं। स्ट्रोक के इलाज के बाद पोस्ट स्ट्रोक रेहाबिलिटेशन की भी जरूरत होती है जिसमें स्पीच थेरेपी और फिजियोथेरेपी से मरीज के ब्रेन के अफेक्टेड एरिया को फिर से ठीक किया जाता है।

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